Monday, 5 April 2021

Paglait Case Study

हां, जब लड़की लोग को अक्ल आती है तो सब उन्हें पगलैत ही कहते हैं क्योंकि दूसरों की ना सुनकर खुद की सुनना पागलपन नहीं तो और क्या है ? घर वालों की दी "भले की ज़िंदगी" को नकारते हुए जब वे अकेले रहने, ख़तरे उठाने, किसी से सहारा न लेने के बारे में तय कर लेती है तो वो पागल ही तो कहलाएगी ? क्योंकि 50 लाख के साथ, घर परिवार में रहकर, अपनों के साये में ज़िंदगी बिताना ही तो एक अच्छी ज़िन्दगी की निशानी है। नहीं? सोचा जाए तो ये ज़िन्दगी अच्छी ज़रूर हो सकती है, लेकिन ये कितनी ख़ुशगवार है ये हर किसी की निजी इच्छाओं पर निर्भर करता है। हो सकता है कि आपके लिए आज़ाद होना, खुद के पैरों पर खड़े होना, गलतियों करना, उनसे सीखना, खुद के रिश्तों को चुनना पागलपन हो, लेकिन कइयों के लिए नहीं। ऐसी ही है पगलैत कि नायिका संध्या की case study।  

उसने Double MA की, मां बाप ने कहा शादी कर लो, कर ली। लड़का 70,000 कमाता था। लड़के ने कभी उसे cheat नहीं किया हालांकि पहले उसका love affair था। लेकिन जब एक बार लड़के ने भी अपने मां बाप के सुझाये रिश्ते में बंधने का फैसला कर लिया तो उसने अपने पुराने रिश्ते को एक सीमा में बांध दिया। वो पुराना रिश्ता भी सात फेरों के बंधन में इसीलिए नहीं बंध पाया था क्योंकि आकांक्षा (संध्या के पति आस्तिक की ex girlfriend) भी अपने मां बाप की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ नहीं जाना चाहती थी। वैसे कभी ज़ोर ज़बरदस्ती से और कभी प्यार से, मां बाप अक्सर अपनी choices हम पर थोप ही देते हैं। ऐसा नहीं कि वो हमसे प्यार नहीं करते या हमें control करना चाहते हैं। बस इसलिए कि वो मां बाप हैं और उन्हें ये चिंता लगी रहती है कि उनके बच्चों को एक अच्छी ज़िन्दगी मिले। इसलिए वो नहीं चाहते कि बच्चे कोई ग़लती कर बैठें और इसी चक्कर में कई बार over protective होते हुए वो खुद ही ग़लती कर बैठते हैं। अपने अनुभवों को समझदारी का पहनावा पहनाकर वो बच्चों की ज़िंदगी की बेहतरी के लिए रोज़ नए फ़ैसले 'सुझाते' रहते हैं। तो फिर क्या मां बाप को बच्चों को कुछ समझाना नहीं चाहिए ? वो जो मन आये करें ? जवाब ज़रा टेढ़ा है। 

 दरअसल माँ बाप को सहारा बनना चाहिए। गिरते उठते बच्चे ने घुटने के बल चलना, फिर पैरों पर खड़े होना खुद ही सीखा था। आपने तो तब बस सहारा दिया था, उंगली थामी थी। हाथ थामने की भी ज़रूरत नहीं पड़ी थी। लेकिन जब उसे ठीक से चलना आ गया तो सड़क पार करते वक्त उसका हाथ थामा था। लेकिन जब बच्चा बड़ा हो गया, तो अब सड़क पार करते वक्त भी उसका हाथ थामने की ज़रूरत नहीं रही। तो यही सब ज़िन्दगी के रास्तों पर चलने के समय क्यों ना किया जाए ? ग़लत फ़ैसले लेने दीजिये, आप उंगली थाम लोगे तो वो बेहतर फ़ैसले लेना सीख जाएगा। लेकिन अगर हमेंशा ही उंगली थामे रखोगे तो कभी भी खुद से सड़क पार करना नहीं सीख पायेगा। ..ये बात लड़का लड़की दोनों पर लागू होती है। लड़की को पढ़ाया और घर का काम करने तक तो "आत्मनिर्भर" बना दिया लेकिन अगर कल को जिसके सहारे आपने उसे छोड़ा था, वो ही कहीं चला गया तो वो क्या करेगी ? पढ़ने के बाद, उस पढ़ाई का उपयोग करना भी तो सीखने दीजिये। यही बात लड़कों के लिए भी ज़रूरी है। उन्हें कमाई करने के साथ साथ खुद की देखभाल करनी भी आनी चाहिए। संध्या के पति आस्तिक की अलमारी, जूते सब सिमटे हुए थे। संध्या ने तो कभी अलमारी को खोला तक नहीं, ज़रूरत ही नहीं पड़ी क्योंकि आस्तिक खुद को व्यवस्थित करना जानता था। ठीक वैसे ही जैसे कि उसकी पूर्व प्रेमिका (ex girlfriend) आकांक्षा। दोनों एक दूसरे के साथ ज़रूरत की वजह से नहीं थे, बल्कि सिर्फ़ इस वजह से थे कि उन दोनों में प्यार था। एक दूसरे के लिए प्यार। इसीलिए आस्तिक और संध्या में कभी वो रिश्ता नहीं बन पाया जिसकी दरकार हर पत्नी को रहती है, प्यार का रिश्ता। 

 संध्या इसमें आस्तिक को दोषी मानती रही। पहले वो सोचती रही कि ऐसा ही होता होगा, प्यार व्यार सब कॉलेज वॉलेज में ही निपटा लेते होंगे। लेकिन जब उसने आकांक्षा को करीब से जाना तो इसे समझ आया कि दरअसल वो तो खुद से ही खुश नहीं थी। जब भीतर ही खुशी ना हो तो बाहर लाख होली मने, होठों पर मुस्कान के रंग नहीं ठहरते। ऐसा ही कुछ दुःख का भी रहता है। जब तक कोई अपना न खोया हो किसी के खोए के दुःख का अहसास किया ही नहीं जा सकता। हाँ, सहानुभूति की जा सकती है, बुरा लग सकता है लेकिन पीड़ा नहीं होती। इसीलिये जब आस्तिक दुनिया से गया तो संध्या को कोई पीड़ा नहीं हुई क्योंकि आस्तिक 5 महीनों की शादी में अभी तक उसकी ज़रूरत भी नहीं बना था। ज़रूरत भी तभी बनती है ना जब आपने किसी के लिए कुछ किया हो, कोई साथ दिया हो। कभी कभार आप इस चक्कर में भी किसी की ज़रूरत नहीं बन पाते क्योंकि उसे पता ही नहीं होता कि आपने उसके लिये क्या किया है। संध्या financially आस्तिक पर dependent थी। ठीक वैसे ही जैसे कि आस्तिक के माता पिता। सब कुछ आस्तिक सम्भाल रहा था तो कभी किसी को ये अहसास ही नहीं हुआ कि वो financially आस्तिक पर dependent होते जा रहे हैं। आस्तिक के पिता ने भी अपना रिटायरमेंट के सारा पैसा नए घर की down payment के लिए आस्तिक को दे दिया। आस्तिक ने भी ऐसा उनसे करवा लिया। किसी के भी, खुद आस्तिक के भी, दिमाग में ये बात कभी नहीं आई कि वो अपने माँ बाप से पहले भी दुनिया से जा सकता है। पत्नी से पहले जा सकता है, ये आई थी। इसीलिए insurance policy का nominee उसने संध्या को बनाया था, माता पिता में से किसी को नहीं। संध्या और आस्तिक तो लगभग हम उम्र होंगे, ये मानकर हम चल सकते हैं क्योंकि आस्तिक की चाची के मुताबिक आस्तिक 27-28 साल का था और संध्या ने Double MA के बाद शादी की थी। 

 अब देखिए की हमारे देश में बेटियों की शादी का बोझ कितना बड़ा होता है कि संध्या की मां को जब ये मालूम हुआ कि उसकी विधवा बेटी को 50 लाख का insurance benefit मिलना है तो वो फट से बेटी से कहने लग गई कि घर चल, पढ़ी लिखी है, आगे पूरी ज़िंदगी पड़ी है, जबकि यही मां पहले संध्या के पिता के ये कहने पर कि संध्या को वापिस घर ले चलते है, वो बाकी दो कुवांरी बेटियों की दुहाई देने लग गई थी। पति बेचारा बेटियों की शादी के बोझ का मारा चुप कर गया। हमारे देश में बेटियों के बाप खुद को यूं ही दबा और कमज़ोर महसूस करते हैं। झुकना उनके स्वभाव में होता है। बेटियां 'अच्छे घर' भी ब्याहनी होतीं हैं। अच्छे घर से मतलब, खानदानी, अच्छा कमाता लड़का, एक ही जाति का, हम उम्र, वगैरह वगैरह। और हाँ लड़की की सही उम्र में शादी न हो तो और दबाव। जैसे जैसे लड़की की उम्र बढ़ती है,पिता का ब्लड प्रेशर और heart beat भी बढ़ती रहती है। 

 जनाब, demands सिर्फ़ लड़की वालों की ही नहीं होतीं। लड़के वालों को भी 70, 000 कमाते लड़के के लिए Double MA टाइप लड़की ही चाहिए होती है। इसलिए नहीं कि लड़की भी कमा के खिलाए बल्कि इस लिए की लड़के की और परिवार की साख रहे। फिर चाहे परिवार के अपने छोटे बेटे का english में हाथ tight हो। पर बहु Double MA होगी तो लोगों को बताने में नाक ऊंची होगी। ..मैं ये नहीं कह रही कि संध्या के ससुर इस तरह की सोच रखते हैं, पर संध्या की सास इस बारे में ज़रूर चौकनी रहती है। तभी तो बेटे की मौत का मातम मनाती हुई को जब ये मालूम पड़ता है कि income tax वाले अफसर की पत्नी का फ़ोन आया है तो वो तुंरत फ़ोन पकड़ लेती है। हमारे देश में बहुओं से न न प्रकार की Expectations रखने का department साँसों ने ही संभाल रखा है। ससुर ज़्यादातर accounts में ही उलझे रहते हैं। रिश्तों की balance sheet मिलाने में ही उनका वक़्त गुज़र जाता है। भाई, बहन के झगड़ों को, मन मुटावों को सुलझाने या उलझाने में ही ज़िन्दगी बसर हो जाती है। इसीलिए सहारे की सबसे ज़्यादा ज़रूरत उन्ही लोगों को पड़ती है जो उन उलझनों को सुलझाने की कोशिश में दम लगाते रहते हैं, जो उलझने कोई और उनके लिए पैदा करके, खुद चला गया हो, चैन की नींद सोने। ..पगलैत के case में आस्तिक। 

 कोई सोता है तो कोई जागता है। हर किसी का अपना sleep cycle होता है। संध्या भी थोड़ा late उठने वालों में से है। चाय नहीं पीती न। morning tea. है ना ये भी अजीब बात ? बल्कि उसे तो pepsi चाहिए होती है। पागल कहीं की। ख़ैर, अब उसे फर्क नहीं पड़ता क्योंकि ज़िन्दगी के अहसासों को करीब से वही समझ पाता है, जिसे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि लोग उसे समझदार कहें या पगलैत। ....और हां। एक और ख़ास बात। ऐसे लोगों को भूख बहुत लगती है। कुछ करने की भूख, कुछ पाने की भूख।

No comments:

Post a Comment

Thanks to all for the valuable feedback. :-)