यह पोस्ट मैं एक आँख के अस्पताल में बैठी सोच रही हूं । लेखन और पढ़न प्रक्रिया का यही दिलचस्प पहलू है । लेखक कहीं भी बैठकर सोच लेता है ओर पढ़ने वाले तो बाथरुम में भी बैठकर पढ़ लेते है। :-) खैर.........
मेरे भईया को जैसे ही मैंने कल यह कहा कि मुझे लगता है कि आपकी आँख पर परदा पड़ गया है, वे आज तुरंत आँख के अस्पताल में पहुंच गये और मुझे भी वहाँ बुला लिया । मैंने उनको कहा कि यहाँ आँख पर से परदा हटाने का इलाज संभव नहीं पर वह माने तब ना । वैसे भी कहने से कब कोई माना है । हर किसी को आज़माना है।
अस्पताल में मेरे पास बैठी मोहतरमा लगातार अपनी दाहिनी आँख मसल रहीं थीं । मैंने पूछा कि आप अपनी ही आँख क्यों मसल रहीं हैं तो वह बोलीं कि कुछ रगड़ रहा है आँख में । मैंने पूछा क्या रगड़ रहा है तो कहतीं पता नहीं । पता नहीं ? हाँ वैसे भी क्या रगड़ रहा है कोई बताता थोड़ी ही है । मैंने कहा आप इसे इतना रगड़ीये मत वरना और तंग करेगा पर वो मानी ही नहीं । वैसे भी कहने से कब कोई माना है । पता नहीं कौन किसे परेशान कर रहा था । आँख उन्हें या वो आँख को ।
भईया की आँख में एक द्रवित पदार्थ डालकर उन्हें कुछ देर के लिए बैठने को कह दिया गया । मैंने सोचा चलो जब तक यह ज़बरदस्ती के आत्म चिंतन में लगा दिए गए हैं मैं ज़रा बाहर हो आऊं । पर इन जकड़नों से कब कोई निकल पाया है । अभी बाहर निकल ही रही थी कि एक वृद्धा स्त्री सादे कपड़ों में नज़र आ गईं । पूछने पर पता चला कि उनकी आँख से पानी बहता रहता है । इस बार मुझे लगा कि शायद यह सही जगह पर आईं हैं । वैसे भी दुनिया में कोई व्यर्थ में तो आया नहीं होगा । यहाँ इनको आश्वासन मिल सकता है । कई लोग आश्वासन बहुत अच्छा दे लेते हैं ।
अब बारी थी आँखों की लिपी पढ़ने के माहिर उस ज्ञानी से मिलने की जो मेरे भईया कि आँख से परदा हटा सकते हैं ऐसा उन्हें विश्वास था । वैसे उनके कमरे के बाहर लगी तख्ती भी यही कह रही थी । पर कहने से कब.................. :-)
कमरे में एक दम अंधेरा करके केवल एक बल्ब को अपने माथे पर बांधकर करीब तीन चार मिनट तक भईया की आँखों में झांकने के बाद उन्होने कहा कि इनकी आँख पर से परदा हट सकता है । मानो दुनिया से कटकर उन्होंने भईया की आँखों की गेहराई में उतरकर कोई तरीका खोज निकाला हो । बोले कि एक बहुत सरल आप्रेशन करना होगा और दर्द भी नहीं होगा । आँख पर से परदा हट जायेगा और दर्द भी नहीं होगा ?? यह बात तो देखते ही बनेगी । वैसे भी कहने से कब कोई माना है । इसे तो आज़माना भी बनता है।
आप सोच रहे होंगे क्या आँखों के पीछे पड़ गई है। क्यों ? आपने ही तो कहा था..."तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है।" :-)
लगे हाथ मैंने भी अपनी आँखें पढ़वानी चाहीं । आजतक पढ़वाने का मन नहीं हुआ था पर वो सज्जन भले लगे इसलिए बैठ गई उनके सामने । पर यह सज्जन भी अजीब थे । सीधा आँखों में देख कर नहीं बताते कि क्या लिखा है । एक यंत्र रख दिया हम दोनों के बीच । शायद आँख नहीं मिला सकते । इस आधुनिक तकनीक के ज़रिए एक दूसरे की आँखों में देखते हुए मुझे ये समझ नहीं आ रहा था कि वह मेरा मुआइना कर रहे हैं या मैं उनका !!
मुहावरों का बहुत रश था यहाँ । सो उन सबको मैं वहीं छोड़कर घर आ गई । मम्मी ने भईया का सब हाल पूछने के बाद कहा.." हाँ! मुझे भी बताया था कि मेरी आँख का पानी सूख चुका है ।" मैंने सोचा हाँ ! समझ सकती हूँ । सूख चुका होगा । 9 साल बीत चुके हैं अब । आज छोटी बहन की पुन्यतिथी है ।